अध्याय 5: आप हमेशा खुद चुनते है


अमेरिकन फिलोसफ़र, विलियम जेम्स अपनी जिंदगी से काफी परेशान रहते थे. क्या-क्या परेशानियां नहीं थी उन्हें. आँखों की बिमारी, कम सुनने की बिमारी और बाकी और भी कई जानलेवा बीमारियों से वे जूझ रहे थे. इन बीमारियों की वजह से उनका ज़्यादातर जीवन घर में बंद होकर ही गुज़रा था. उन्हें पेंटिंग का बड़ा शौक था तो वो सारा दिन पेंटिंग बनाया करते थे. हालांकि किसी को नहीं लगता था कि वे अच्छी पेटिंग बना सकते है. उनके पिता ने उन्हें मेडिकल स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया मगर वे सब कुछ छोड़कर Amazon Rainforest में एंथ्रोपोलोजिकल एक्स्पेडीशन करने चले गए. हैरानी की बात तो ये थी कि उनकी सेहत ने भी उनका साथ दिया. लेकिन फिर उन्हें स्माल पॉक्स हो गया जिससे वे मरते-मरते बचे. उन्हें अपना एक्सपीडीशन बीच में ही छोड़ना पड़ा. उनके सभी साथी आगे बड गए थे और वे अकेले ही साउथ अफ्रीका में रह गए. किसी तरह वहां से निकलकर वे न्यू इंग्लैण्ड पहुंचे जहाँ उनके पिता जो पहले से ही उनसे निराश थे, उनका इंतज़ार कर रहे थे. अपने जीवन की तमाम तकलीफो झेलने के बाद एक रात जेम्स ने फैसला किया कि अब से वे अपनी जिंदगी की हर रिसपोंसेबिलिटी खुद लेंगे. और अपने जीवन को बदलने की हर संभव कोशिश करेंगे. उन्होंने ये तक सोच लिया था कि अब अगर उन्होंने हार मानी तो पक्का वे सुसाइड कर लेंगे.

खैर, बड़ी बात को छोटा करके हम बताना चाहते है कि विलिंयम जेम्स ही वो इंसान थे जो अमेरिकन साइकोलोज़ी के जन्मदाता बने. ये कहानी सीख देती है कि अपने कामो की जिम्मेदारी हमें खुद ही लेनी है ना कि दुसरो के भरोसे रहकर बैठना है.

अब मान लीजिये कि आपका लाइफ पार्टनर जिसे आप बहुत प्यार करते है, आपसे एक हफ्ते में 30 किलो वजन कम करने को बोलता है वर्ना वो आपको छोड़ कर चला जाएगा. अब ऐसी शर्त सुनकर आपका दिमाग तो ठनक ही जाएगा. क्यों है ना ?

अब सोचिये कि आप जिम जाना शुरू कर देते है, हेल्दी खाना शुरू कर देते है और 30 किलो वजन कम भी कर लेते है. कैसा लगेगा आपको ? बहुत अच्छा ना? मगर अब आपकी फीलिंग आपके पार्टनर के लिए क्यों बदल गयी ? क्योंकि आपको ऐसा करने के लिए बोला गया था, ये आपने खुद नहीं चुना था. मगर जब आप चीज़े खुद अपनी मर्ज़ी से चुनते है तो पूरी जान लगा देते है फिर चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों ना आये. और उन मुश्किलों से गुज़र कर आप बहुत अच्छा महसूस करते है. इसलिए अपनी परेशानियां भी खुद ही चुनिए, क्योंकि जिंदगी में कोई भी समस्या कब और कैसे आ जाए कोई नहीं जानता.

ओब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (Obsessive-compulsive disorder) जिसे आमतौर पर ओसीडी भी कहा जाता है एक तरह का न्यूरोलोजिकल और जेनेटिक डिसआर्डर होता है. इस बिमारी का कोई ठोस इलाज़ अभी तक नहीं मिल पाया है हालांकि इसे कुछ हद तक मैनेज किया जा सकता है. तो जो लोग इस बीमारी से जूझ रहे है वे कैसे इस बिमारी को मैनेज करते होंगे ? इसका ज़वाब है अपने विचारों को बदल के. जो लोग जर्म्स के डर से सारा दिन हाथ धोते रहते है उन्हें सीखना होगा कि हम चाहे जो कर ले जर्म्स हमेशा हमारे आस पास रहते है, इन्हें पूरी तरह से नहीं हटाया जा सकता है. कुछ और लोग जो इस डर से कि उनका परिवार मर जाएगा अगर वे एक ही जगह पर बार-बार Tap नही करेंगे, उन लोगो को ये समझने की जरूरत है कि मौत एक दिन सबको आनी है. जो जन्म लेता है वो एक दिन मरता ही है और वे इसे किसी भी सूरत में नहीं रोक सकते. बजाये एक ही विचार में उलझने के जिंदगी में और भी बहुत कुछ मीनिंग फुल किया जा सकता है. ऐसे विचार आते है तो आने दे उन्हें रोकिये नहीं मगर अपने विचारों की दिशा बदलने की कोशिश ज़रूर कीजिये. ऐसे लोग जिंदगी से उम्मीद खोने के बजाय इन विचारों के साथ जीना सीख ले तो अपनी जिंदगी बेहतर बना सकते है.

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