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Showing posts from November, 2019
law 1: you control your life by control your time. controlling our lives means controlling our time and controlling our time means controlling the events in our lives. you need to stop thinking "time management" and start thinking about "event control". too often we think time management has has something to do with our watches the only thing the watch tell you is how long it takes  the sun to across the sky. that's an event over which we have no control. the real issue is : what event can i control? focusing on controlling the events of our lives make all the different. law 2 : you governing  values are the foundation of personal success and fulfillment. each of us lives according to  unique set of governing values. these values are the think most important to you. they are represented by the clearest answers you can give to these questions : what are the highest priorities in my life? and of these priorities, which do i value most? even though our gove...
अध्याय 5: आप हमेशा खुद चुनते है अमेरिकन फिलोसफ़र, विलियम जेम्स अपनी जिंदगी से काफी परेशान रहते थे. क्या-क्या परेशानियां नहीं थी उन्हें. आँखों की बिमारी, कम सुनने की बिमारी और बाकी और भी कई जानलेवा बीमारियों से वे जूझ रहे थे. इन बीमारियों की वजह से उनका ज़्यादातर जीवन घर में बंद होकर ही गुज़रा था. उन्हें पेंटिंग का बड़ा शौक था तो वो सारा दिन पेंटिंग बनाया करते थे. हालांकि किसी को नहीं लगता था कि वे अच्छी पेटिंग बना सकते है. उनके पिता ने उन्हें मेडिकल स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए क्या कुछ नहीं किया मगर वे सब कुछ छोड़कर Amazon Rainforest में एंथ्रोपोलोजिकल एक्स्पेडीशन करने चले गए. हैरानी की बात तो ये थी कि उनकी सेहत ने भी उनका साथ दिया. लेकिन फिर उन्हें स्माल पॉक्स हो गया जिससे वे मरते-मरते बचे. उन्हें अपना एक्सपीडीशन बीच में ही छोड़ना पड़ा. उनके सभी साथी आगे बड गए थे और वे अकेले ही साउथ अफ्रीका में रह गए. किसी तरह वहां से निकलकर वे न्यू इंग्लैण्ड पहुंचे जहाँ उनके पिता जो पहले से ही उनसे निराश थे, उनका इंतज़ार कर रहे थे. अपने जीवन की तमाम तकलीफो झेलने के बाद एक रात जेम्स ने फैसला किया कि ...
बेजुबां पत्थर पर लद्दे थे लाखो के गहने उसी , उसी दहलीज पर 1 रूपये के लिए रोते नाह्ने हाथों को देखा हैं।  सजे थे 56 भोग मुरत के आगे उसी मन्दिर के बहार  मैंने 2 वक्त के  खाने  लिए struggle करते लोगो को देखा है।  लदी हुई है रेशमी चादर से वो हरी मज़ार लेकिन  उसी के बहार  ठण्ड  ठिठुरती बूढी  अम्माँ को देखा है।  दे आया  लाखो रूपये गुरूद्वारे की सफाई के लिए।  लेकिन उसी घरमे 500 rs के लिए  बाई से लड़ते देखा   हुए है।  सुन है पर चढ़ा था कोई  दर्द मिटने को सूली पर ।  आज  चर्च में बेटे की  मार से  बीमार माँ बाप को  देखा है।  जिसने न दी माँ बाप को रोटी जीते जी।  मरने के बाद लोगो के लिए भंडरा करवाते देखा है।  मारा गया पंडित वो सड़क पर दर्घटना में यारो  जिसने अपने आप को वो कल सर्व तारे और हाथ की लकीरो का माहीर  बताया है   जिसकी घर की एकता का कभी ज़माना भी देता था मिसाल।  आज उसी आंगन में खींचती हुई दीवा...