Part 2
Part 2
अध्याय 2: खुशियों के पीछे मत भागिए
पच्चीस सौ साल पहले की बात है. नेपाल में एक राजा हुआ करता था जो अपने बेटे से बहुत प्यार करता था और उसके लिए बड़े-बड़े सपने देखा करता था. वो अपने बेटे को दुनिया की हर चीज़ देना चाहता था ताकि उसे कभी भी किसी चीज़ की कमी ना हो. अपने बेटे को खुश रखने के लिए उसने बहुत बड़ा महल बनवाया जिसके चारो ओर ऊँची दीवारे थी. वो नहीं चाहता था कि उसके बेटे को बाहर की दुनिया के बारे में कुछ भी पता चले. वो उसे हर दर्द, हर तकलीफ से बचा कर रखना चाहता था. महल में राजकुमार के लिए हर सुख-सुविधा मौजूद थी मगर राजकुमार फिर भी खुश नहीं रहता था. वो इस एशो-आराम से अब उबने लगा था. वो अब महल से बाहर की दुनिया देखना चाहता था. तो एक दिन मौका देखकर वो महल से बाहर निकल गया. अपने राज्य में घुमते हुए राजकुमार को पहली बार दर्द का एहसास हुआ जब उसने भूखमरी और बिमारी से तडपते हुए गरीब इंसानों को देखा. उन्हें देखकर राजकुमार दुःख में डूब गया. उसे अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया जिसने उसे आजतक इस सच्चाई से अनजान रखा था. उसने फैसला किया कि वो राजपाट छोड़कर भिक्षुक का जीवन जियेगा. और उसके बाद राजकुमार चुपचाप बिना किसी को कुछ बताये महल छोड़कर जंगल में चला गया. कुछ साल जंगल में गुज़ारने के बाद राजकुमार को एहसास हुआ कि उसकी इस कठिन तपस्या और भूखे प्यासे रहने से कोई फायदा नहीं है. ज़रूरी नहीं कि जो चीज़ तकलीफदेह हो वो आपके लिए अच्छी और फायदेमंद हो. उसने ये जाना कि जीवन अपने आप में एक तकलीफ है. अमीर आदमी अपने पैसे की वजह से तकलीफ सहता है और गरीब आदमी इसलिए परेशान रहता है क्योंकि उसके पास पैसे की कमी है. असल बात तो ये है कि ख़ुशी का कोई पैमाना नहीं होता . कुछ हासिल करने का ये मतलब नहीं कि अब आप हमेशा के लिए खुश रहेंगे. हम तकलीफ इसीलिए सहते है क्योकि इससे हमें इंस्पायर्ड होते है, इससे हमारे अन्दर कुछ बदलाव आते है. और जीवन में बदलाव बहुत ज़रूरी है. हमारे जीवन की तकलीफे हमें लड़ने की ताकत देती है , हम हर हाल में खुद को बचाए रखने की ज़दोज़हद करते है. दर्द ही हमें सिखाता है कि हम चीजों पर ध्यान दे जब हम लापरवाह होते है. इसलिए तो खुशियाँ और सुख सुविधाए हमेशा ही बेस्ट ऑप्शन नहीं होती कभी-कभी दर्द भी ज़रूरी है. यहाँ तक कि साइकोलोजिकल पेन भी बड़े काम की चीज़ है जो हमें भविष्य के बेहतर फैसले लेना सिखाती है. खुशियाँ कभी भी बिना मुसीबतों से लडे नहीं पाई जा सकती है. दुसरे शब्दों में कहे तो परेशानियों का दूसरा नाम ही खुशियाँ है. क्योंकि जब आप अपनी समस्या सुलझा लेते है तो ख़ुशी खुद-ब-खुद आपके चेहरे पर झलकने लगती है. तो इस तरह अपनी तकलीफों को अवॉयड ना करना ही आपकी खुशियों की चाबी है. यहाँ पर ख़ुशी का की-वर्ड असल में प्रोब्लोम्स को सोल्व करना है.
भावनाओं को हमेशा ही बड़ा चड़ा कर माना जाता है. हमारे इमोशंस आखिर क्या है ?
भावानाये यानी इमोशंस दरअसल हमारा दिमाग ही तो है जो हमें बताता है कि कुछ गलत हो रहा है और उसे ठीक किया जाना चाहिए. सीधे-सादे शब्दों में कहे तो हमारे नेगेटिव इमोशन हमें एक्शन लेने के लिए मजबूर करते है वहीँ दूसरी तरफ हमारे पोजिटिव इमोशन का मतलब है कि हमारा दिमाग हमे सही चीज़ करने के लिए इनाम दे रहा है. अब सवाल ये उठता है कि “ आप अपने जीवन में करना क्या चाहते है ?”
इस सवाल में कोई खास बात नहीं है, बहुत ही आम सा सवाल है ये. इसके बजाये सवाल होना चाहिए कि “ आप अपने जीवन में किस तरह की तकलीफ से गुज़रना चाहेंगे?’
बहुत से लोग नहीं करते मगर आप अपने स्ट्रगल खुद चुनिए. ज़्यादातर लोग सिर्फ बिना किसी तकलीफ के सिर्फ रिवार्ड चाहते है. इससे बुरा और क्या हो सकता है कि बिना कुछ किये आपको सबकुछ मिल जाए. तो अपने लिए खुद ही तकलीफे चुन लीजिये क्योंकि आखिर तो जिंदगी आपको फिर भी दर्द ही देगी, और वो आपके लिए ज्यादा दर्दनाक होगा.
You can't able to define happiness without comparison men's
The height of personal happiness can only be measured by the depth of personal sadness. Happiness is not a stand-alone feeling. Happiness is a comparative emotion. The measure of happiness a person feels is judged against the measure of sadness a person felt in the past. The greater degree of sadness, the greater degree of happiness. Without sadness, happiness has no meaning. Ironically, the fear of emotional sadness often restricts a person’s ability to experience the high heights of happiness.

Still imIhappy😄😄😄😄🥰😁😂😁
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